किसी ने सही लिखा है नारी जब गरजती है तो इतिहास बदल देती है। 36 साल तक पुलिस की नौकरी की और जिंदगी में कई उतार-चढ़ाव देखे, लेकिन हार नहीं मानी। सबका डटकर बहादुरी से सामना किया। मुंबई बम धमाकों के दोषी याकूब मेमन और आतंकवादी अजमल आमिर कसाब की फांसी भी उनकी निगरानी में हुई। साथ ही फेमस सेलिब्रिटी एक्टर संजय दत्त का हाई प्रोफाइल केस भी उन्होंने ही संभाला।
उन्होंने अपनी जिंदगी से जुड़े कई किस्से अपनी नई किताब ‘मैडम कमिश्नर’ में लिखे हैं। हम बात कर रहे हैं पंजाब के गुरदासपुर की रहने वाली डॉ. मीरा चड्ढा बोरवणकर के बारे में। डॉ. मीरां चड्ढा बोरवणकर का जन्म पंजाब के गुरदासपुर में हुआ। मीरा के पिताजी लाहौर से हैं और मां सियालकोट की रहने वाली है। विभाजन के बाद मीरा के पिताजी पाकिस्तान से भारत आ गए। पिताजी पंजाब पुलिस में रहे तो उनका बचपन पंजाब के फाजिलका, फिरोजपुर, फरीदकोट और जालंधर में बीता।
बचपन से ही पिताजी की पुलिस की वर्दी मीरा को आकर्षित करती थी लेकिन उन्होंने कभी सोचा नहीं था कि एक दिन वो खुद पुलिस में जाएगी। उनकी पर्सनैलिटी हमेशा से टॉम बॉय जैसी रही है। घर में 22 राइफल थी इसलिए उन्होंने शूटिंग करना भी सीख लिया। छोटी सी उम्र में ही मीरा ने पुलिस जीप चलाना भी सीख लिया था। पंजाब पुलिस के पास घोड़े थे तो इस बहाने वो घुड़सवारी भी कर लेती थी।
लेकिन मीरा के पापा नहीं चाहते थे कि वो पुलिस फोर्स में जाएं। इसलिए उन्होंने सिविल सर्विसेज में जाने का फैसला किया और तैयारी करकर एग्जाम पास कर लिया और इंडियन ऑडिट एंड अकाउंट्स सर्विस जॉइन कर ली। पर वहां मीरा का मन नहीं लगा इसलिए मीरा ने पुलिस की नौकरी जॉइन कर ली।
पुलिस की नौकरी 24X7 होती है। करियर और फैमिली के बीच बैलेंस करना बहुत मुश्किल काम नहीं है। अगर मन में कुछ करने का जज्बा हो। उनकी शादी पुलिस की नौकरी ज्वाइन करने से पहले हो गई थी। धीरे धीरे उन्होंने अपनी फैमिली प्लान की। शादी के 4 साल बाद उन्हें बेटा हुआ। दूसरा बेटा 5 साल के बाद हुआ।
जब मीरा का बेटा 5 साल का हुआ तब उन्होंने जिला पुलिस प्रमुख बनने की जिद की। उनकी फाइल को 2 बार उस समय के मुख्यमंत्री रहे शरद पवार ने रिजेक्ट कर दिया क्योंकि तब तक किसी महिला को जिला पुलिस प्रमुख नहीं बनाया गया था। लेकिन उस समय तक मीरा की 10 साल की सर्विस पूरी हो गई थी। और इस वजह से उन्हें औरंगाबाद की पहली महिला डिस्ट्रिक्ट पुलिस चीफ बनाया गया।
1994 में उन्होंने जलगांव सेक्स स्कैंडल पकड़ा और उसकी छानबीन की जिसमें स्कूल की बच्चियों से लेकर कॉलेज की लड़कियों को देह व्यापार में ढकेला जा रहा था। जब वो ये केस हैंडल कर रही थी। तब उन्हें पता चला कि लड़कियां FIR दर्ज करवाने के बजाए सिर्फ रोती रहती थी। और जो उनके साथ हो रहा था उसे चुपचाप सहन कर रही थी।
धीरे धीरे उन्होंने इस रैकेट के बारे में जांच पड़ताल की और मामले की तह तक जाकर इस रैकेट को सॉर्ट आउट किया। इस रैकेट को पकड़वाने के बाद लोग उनका नाम और काम जानने लगे।
उसके बाद एक बार जब वो जुआ के मामले में रेड करने जा रही थी। तो भद्रकाली पुलिस स्टेशन के स्टाफ को यह बहुत बुरा लगा कि मैडम आईपीएस है तो वह जीप में आगे बैठेंगी और हमारे 6 फुट के इंस्पेक्टर पीछे बैठेंगे।
बता दें पहले पुरुष प्रधान पुलिस विभाग को एक महिला अफसर की बात मानना अच्छा नहीं लगता था। लेकिन मीरा का काम देखकर उन्हें स्टाफ और नागरिक सपोर्ट करने लगे। बता दें मीरा को खुद को साबित करने में करीब 15 से 20 साल लग गए।
कहते है जब तक आप खुद हार नहीं मानते आपको कोई नहीं हरा सकता। डॉ. मीरां चड्ढा बोरवणकर ने भी हार नहीं मानी। और जिंदगी में कई तरह की मुश्किलों का डटकर सामना करते हुए एक अलग पहचान बनाई।
ये एक ऐसी महिला शख्सियत थी जिन्होंने समाज में अपने काम के साथ अपनी छाप छोड़ी।