द नगरी न्यूज़ डेस्क : लोकसभा चुनाव 2024 में राजस्थान में बीजेपी को बड़ा नुकसान हुआ है.बीजेपी जीत कर भी हार गई है जहां राजस्थान में बीजेपी पिछले 10 साल से 25 की 25 सीटे अपने नाम कर रही थी तो वही इस बार बीजेपी 14 सीटों पर ही सिमट कर रह गयी है और इसी के साथ उसका मिशन 25 भी फैल हो गया तो वही कांग्रेस हार कर भी जीत वाला जश्न माना रही है कांग्रेस और इंडिया गठबंधन ने 11 सीटों पर जीत दर्ज की लेकिन अब सवाल ये है की आखिर इस बार बीजेपी फिर से 25 सीटों पर कबज़ा करने में नाकाम कैसे रही
चलिए जानते है की बीजेपी की हार के पीछे की बड़ी सियासी कहानी क्या है, इसे लेकर खूब बातें हो रही है. लेकिन राजस्थान के वरिष्ठ पत्रकारों की माने तो बीजेपी की नई लीडरशिप टीम पूरी तरह से फेल हुई है दरअसल, राजस्थान में टिकट के बंटवारे में पार्टी अध्यक्ष और अन्य नेताओं ने सही फैसला नहीं लिया है. जिसका असर अब चुनाव के नतीजों पर पड़ा है. वहीं, कुछ पत्रकारों का कहना है कि सरकार का भी कोई असर नहीं दिखा है. प्रशासन का कोई बड़ा असर नहीं बन सका और इसके साथ कई सीटों पर अपने लोगों को मैनेज करने में यहां पर पार्टी में कोई बड़ी कोशिश नहीं हुई है. ऐसी कई वजहें हैं जो इन्हे नुकसान उठाना पड़ा है. राजस्थान में पुराने नेताओं की सभाएं भी बेहद कम कराई गईं. उनकी सलाह भी बेहद कम ली गई है.राजस्थान में इस बार बीजेपी ने लगभग 10 नए चेहरों को मैदान में उतारा था. बाकी सीटों पर पुराने चेहरों को रिपीट किया है.
वरिष्ठ पत्रकार विनोद पाठक कहते है की राजस्थान की कई सीटों पर टिकट में बदलाव करना था लेकिन पार्टी ने वहां पर मुंह फेर लिया. जैसे सवाईमाधोपुर, बाड़मेर-जैसलमेर, चूरू, दौसा, सीकर आदि सीटों पर प्रत्याशी का चयन ठीक नहीं हुआ. वहां पर भाजपा को नुकसान उठाना पड़ा है. नागौर की सीट का असर जोधपुर के साथ पाली और दूसरी सीटों पर भी असर पड़ा है. यहां पर टिकट वितरण पर ध्यान देना चाहिए था.
राजस्थान के वरिष्ठ पत्रकार जगदीश शर्मा का कहना है कि वैसे इस सरकार में नए लोग कम हैं, लेकिन इनके पास प्रशासन का अनुभव ज्यादा नहीं है. इसका असर भी पड़ने लगा है. कई जगहों पर नाराजगी भी बनी हुई है. भरतपुर, धौलपुर -करौली, दौसा और सवाईमाधोपुर में इसका असर भी दिखा है. हालांकि, पार्टी अध्यक्ष तीसरी बार सांसद बने हैं. उन्हें तो मझा हुआ खिलाड़ी माना जा रहा है. फिर भी सीटें कम हुई है. मुख्यमंत्री के साथ दोनों डिप्टी सीएम शासन में कमजोर माने जा सकते हैं.
वरिष्ठ पत्रकार हरीश मलिक कहते है कि स्थानीय स्तर पर काम नहीं हुआ. बीजेपी नेता सिर्फ पीएम नरेंद्र मोदी के सहारे ही रह गए, जिसे लेकर यहां के सामान्य कायकर्ताओं में गुस्सा और नाराजगी थी. टिकट बंटवारे के साथ ही नाराज नेताओं को मनाया नहीं गया. पूर्वी राजस्थान हो या मेवाड़ सभी क्षेत्रों में नाराजगी बनी रही. कुछ सीटों पर पार्टी ने प्रयास किया लेकिन बाकी जगहों पर छोड़ दिया गया था. जिसका असर परिणाम पर दिखा है.