कांग्रेस में इन दिनों दबी आवाज में तकरार की एक ध्वनि सुनी जा सकती है। कुछ वाकए एक के बाद एक ऐसे हुए हैं जिन्होंने एक बार फिर न सिर्फ शीर्ष कांग्रेसी नेतृत्व बल्कि कांग्रेस की प्रशासनिक एवं सांगठनिक रणनीतियों पर भी प्रश्न खड़े कर दिए हैं। राजनीतिक जानकारों का कहना है कि कांग्रेस में प्रशासन एवं संगठन का मतलब क्रमशः राहुल गांधी और के. सी. वेणुगोपाल ही रह गया है। शक्तियों पर एकाधिकार वाली स्थिति बनने पर कांग्रेस में फूट वाली दरारें भी दिख रही हैं। हो सकता है इसका कारण कुछ और हो लेकिन अभी राजनीतिक गलियारों में यही चर्चाएं हैं। समसामयिक कांग्रेस में हाल में बड़ी फूट पड़ी है लेकिन वेणुगोपाल ने ही सांगठनिक कौशल से पूरी पार्टी को संभाला था और अब उन्हीं के कौशल पर प्रश्न खड़े होने लगे हैं। जिस गति से के.सी. पर प्रश्न खड़े होने लगे थे उतनी ही तीव्र गति से कांग्रेस के पारिस्थिकी तंत्र ने मुद्दे की गंभीरता को भांपते हुए वेणुगोपाल समर्थन में कहानियां प्रसारित कर दीं। लेकिन कांग्रेस अब डीके शिवकुमार, शशि थरूर और राशिद अल्वी का उत्तर नहीं ढूंढ पा रही है।
डी के शिवकुमार मुखर होकर प्रदेश की कमान मांग रहे हैं और बगावती सुर अख्तियार कर रहे हैं। कहा जा रहा है ये बगावती सुर प्राथमिक और कुंभ में शामिल होना द्वितीयक कारण है, राहुल गांधी के कर्नाटक में आयोजित हुए निवेश समिट में शामिल न होने का। इसी बीच शशि थरूर ने भी प्रधानमंत्री मोदी की प्रशंसा कर दी जिस पर राहुल गांधी ने उन्हें समन कर दिया। केरल प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष के. सुधाकरण ने उनकी आलोचना कर दी जो अधिक अपमानित करने वाला था क्योंकि थरूर न सिर्फ राजनीतिक कद में बड़े हैं बल्कि पार्टी संगठन में भी सुधाकरण से अधिक मजबूत कैडर पर पकड़ रखते हैं। बात इतनी बढ़ गई कि शशि को यहां तक कहना पड़ा कि अगर कांग्रेस को उनकी जरूरत नहीं है तो उनके पास अपने विकल्प हैं। मसलन, थरूर ने भाजपा के मोदी की नहीं बल्कि देश के प्रधानमंत्री की अमेरिका में हुई अगवानी की एवं भाजपा सरकार नहीं भारत सरकार की विदेश नीतियों की तारीफ की थी ।
इसके बाद राशिद अल्वी के बयान ने तो केसी वेणुगोपाल के कौशल पर उठ रहे प्रश्नों पर सही ठहरा दिया अल्वी ने कहा कि कांग्रेस में लंबे समय से जमीनी नेताओं को दरकिनार किया जा रहा है जिससे कांग्रेस को नुकसान हो रहा है। राशिद अल्वी के बयान से प्रतीत होता है कि कांग्रेस का एक विशिष्ट गुट थरूर पर हमला करने के लिए एक अवसर मात्र के इंतजार में था और लोहा गर्म होते ही उन्होंने हथोड़े से प्रहार कर दिया। इससे इतर डी के शिवकुमार ने भी अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे पर सीधा प्रहार करना पड़ गया। लेकिन शिवकुमार का यह कहना कि मल्लिकार्जुन खड़गे के नाम में ही शिव है और क्या वो अपना नाम बदलेंगे, प्रहार कम अपितु पलटवार अधिक जान पड़ता है। अब तक सिर्फ के सी वेणुगोपाल यानि अघोषित नेतृत्व पर प्रश्न उठ रहे थे लेकिन अब तो सवाल घोषित नेतृत्व पर उठ रहे हैं और वो भी स्वयं बड़े नेता खड़े कर रहे हैं। इन सभी प्रकरणों और बयानों ये साफ कर दिया है कि सांगठनिक स्तर पर एक दरार पड़ चुकी है जिसके बड़े होने से पहले ही कांग्रेस उस पर लीपापोती करने की कोशिश कर रही है। लेकिन चुनावों जीत से कोसों दूर होती जा रही भारत के ग्रैंड ओल्ड पार्टी कब तक इस तरह लीपापोती कर अपनी कमियों को छुपा लेगी, कब तक धरातल पर काम करने वाला इनका कार्यकर्ता इन बातों से अछूता रहेगा और सबसे खास कब तक इन दरारों की कीमत कांग्रेस अपनी चुनाव हार के रूप में चुकाती रहेगी?